बीकानेर में प्रशासन की नींद हराम करने वाली सच्चाई: टूटी सड़कें, बढ़ती चोरी, और जनप्रतिनिधियों की मौन साधना!
पत्रकार नारायण उपाध्याय की स्पेशल रिपोर्ट
बीकानेर, दैनिक खबरां। लगता है इस शहर के जिम्मेदारों को कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि जनता किस हाल में जी रही है। साल का सबसे बड़ा त्योहार दीपावली सिर पर है, लेकिन बीकानेर की सड़कों और सुरक्षा हालात देखकर लगता है मानो शहर पर अफसरशाही और लापरवाही का ग्रहण लग गया हो। कलेक्टर की मीटिंग, अफसरों की फाइलें, जनप्रतिनिधियों के बयान सब कागज़ों में चमकते हैं, जमीनी हकीकत में नहीं।
बीकानेर की जनता आज बस इतना पूछना चाहती है“आख़िर किस जन्म की सज़ा मिल रही है हमें?” क्या प्रशासन और हमारे नेता दीपावली की रोशनी सिर्फ अपने बंगले तक सीमित रखेंगे, या कभी आम जनता के रास्तों को भी देखेंगे? ना चैन से सो सकते हैं, ना सड़कों पर आराम से चल सकते हैं। पूरे शहर में गड्ढों के बीच जूझती गाड़ियां और पैदल चलने वालों की जान पर बन आई है। कई जगह तो हालात ऐसे हैं कि गड्ढे सड़क में हैं या सड़क गड्ढों में समझना मुश्किल है।
कलेक्टर के वादे और हकीकत में जमीनी फर्क
शुक्रवार को जिला कलेक्टर ने अधिकारियों की बैठक लेकर कहा “दीपावली तक बीकानेर की सड़के चमकनी चाहिए।” पर उसी बैठक में सहायक अभियंता ने ठंडे लहजे में जवाब दे दिया “जनवरी 2026 तक सड़के ठीक होंगी।” यानी जनता को फिर वही पुराना वादा, वही पुराना झूठ और वही “फोटो खिंचवाकर काम पूरा दिखाने” वाला खेल। पीआरओ साहब प्रेस नोट जारी कर देते है, मीडिया में बयान छप जाता है, लेकिन धरातल पर हालत जस की तस। सवाल उठता है। आख़िर ये प्रेस नोट जनता के लिए हैं या अफसरों की इमेज चमकाने के लिए?
सड़कें बनी जानलेवा
बीकानेर की मुख्य सड़कों का हाल ऐसा है कि गाड़ी चलाना तो दूर, पैदल चलना भी जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। अगर ऊपर वाले की कृपा और बीकानेर के धर्म की छाया न हो, तो शायद लोग घर सकुशल लौट भी न पाएं। अगर बीकानेर में टूटी फूटी सड़कों की गिनती की जाए तो शायद एक अख़बार का पूरा पेज ही भर जाएगा। बीकानेर को अब “वादों” की नहीं, वास्तविक सुधार की जरूरत है।

जनप्रतिनिधि कहाँ हैं,मैदान में या पोस्टरों में?
बीकानेर की जनता आज खुद पूछ रही है,हमारे नेता आखिर हैं कहाँ? चुनाव के समय जो जनसेवक मोहल्लों में झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाते थे, अब उन झाड़ुओं पर भी धूल जम गई है। सांसद, विधायक, पार्षद सब गायब हैं। शहर की सड़कों की दुर्दशा, चोरियों की बढ़ती घटनाएं, गली-गली फैली गंदगी किसी को कोई मतलब नहीं। बस फेसबुक पर बधाई संदेश, ट्विटर पर सरकारी योजनाओं की री-पोस्ट और यूट्यूब पर अपनी उपलब्धियों के वीडियो यही इनकी “जनसेवा” बन गई है। जनता की आवाज़ सुनना तो दूर, अब तो नेताओं के फोन तक पहुंचना मुश्किल हो गया है।
शहर में चोरों का आतंक, गश्त बन गई औपचारिकता
उधर, शहर में चोरों के हौंसले भी बुलंद हैं। दिन-दहाड़े लूट, रात को चोरी अब ये आम बात हो गई है। शहर के हालात ऐसे हैं कि रात को घरों में ताले लगाकर भी लोग चैन से नहीं सो पाते। हर रोज़ नई वारदातें सामने आ रही हैं कहीं मंदिर से चोरी, कहीं मकान में सेंध, तो कहीं राहगीरों से लूट। पुलिस गश्त बस औपचारिकता बन चुकी है गाड़ियां मुख्य मार्गों से घूमकर लौट जाती हैं, गलियों में चोरों का राज चलता है। आमजन में भय का माहौल है, और जनप्रतिनिधि सोशल मीडिया पर बधाई संदेश पोस्ट करने में व्यस्त हैं। जनता दबी ज़ुबान में कहने लगी है “अब डर चोरों से नहीं, लापरवाहों से है।”बीकानेर के लोगों का कहना है कि अब उन्हें “मीटिंगों और घोषणाओं” से नहीं, बल्कि ज़मीनी सुधार से मतलब है। जनता चाहती है कि दीपावली की रोशनी सिर्फ़ अफसरों के बंगलों तक नहीं, हर गली और हर सड़क तक पहुंचे। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों दोनों को अब यह समझना होगा कि जनता अब सिर्फ़ सुनने नहीं, सवाल पूछने लगी है।
बिगड़ा ट्रैफिक सिस्टम,जाम में जकड़ा बीकानेर
बीकानेर का ट्रैफिक सिस्टम पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। शहर की सड़कों पर सुबह से लेकर देर रात तक जाम का आलम ऐसा है कि लोगों का सफर सिरदर्द बन गया है। कोटगेट से लेकर दाऊजी मंदिर रोड, स्टेशन रोड, सादुल स्कूल के सामने, रानीबाजार माल गोदाम रोड, रोशनीघर चौराहा, फड़ बाजार, जूनागढ़ मार्ग, एमएस कॉलेज ब्रिज से गंगानगर सर्किल तक हर जगह एक ही नज़ारा है। वाहन रेंगते हैं, लोग झुंझलाते हैं और प्रशासन मौन है। ट्रैफिक पुलिस की स्थिति और भी चिंताजनक है। कहीं सुस्त खड़ी दिखाई देती है, कहीं इक्का-दुक्का जवान नजर आते हैं, तो कई जगहों पर तो तैनाती ही नहीं है। शहर के प्रमुख मार्गों पर बिना नियंत्रण के वाहन दौड़ रहे हैं, अवैध पार्किंग और ठेले वालों ने सड़कों को संकरा बना दिया है। आमजन परेशान हैं, पर किसी को इसकी फिक्र नहीं।

कोटगेट जैसे भीड़भाड़ वाले एरिया में तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि एम्बुलेंस तक जाम में फंस जाती हैं। दाऊजी मंदिर रोड पर शाम के समय निकलना किसी परीक्षा से कम नहीं, जबकि स्टेशन रोड और फड़ बाजार में तो दोपहिया वाहन भी धकेलकर निकालने पड़ते हैं। सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपए स्मार्ट सिटी के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं, तो स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम आखिर कब दिखाई देगा? देखें वीडियो…..👇👇

