वीआईपी के कदम पड़ने से पहले जागा प्रशासन, बीकानेर की सड़कें भी बोली—“साहब पहले क्यों नहीं आए?”

Bikaner Editor Rajasthan

वीआईपी के कदम पड़ने से पहले जागा प्रशासन, बीकानेर की सड़कें भी बोली—“साहब पहले क्यों नहीं आए?”

बीकानेर। वाह रे प्रशासन…! जिस बीकानेर की टूटी सड़कें महीनों तक आम आदमी की कमर तोड़ती रही, जहां रोजाना लोग गड्ढों में वाहन फंसाकर जिम्मेदारों को कोसते रहे, उसी शहर की सड़कें अब अचानक जवान हो गई हैं। कारण भी खास है… शहर में वीआईपी मूवमेंट जो है। देश के सम्मानीय गृह मंत्री और प्रदेश के मुखिया जी का दौरा तय क्या हुआ, अफसरशाही की नींद खुल गई। रातों-रात सड़कें चमकने लगीं, चौक-चौराहे धुलने लगे और पेचवर्क ऐसे होने लगा जैसे बीकानेर की किस्मत ही बदल दी गई हो।


मजेदार बात ये है कि जिन सड़कों पर महीनों से गड्ढे मुंह फाड़े खड़े थे, वहां आम आदमी रोज हिचकोले खाता रहा, लेकिन तब जिम्मेदार विभागों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। ना नगर निगम जागा, ना पीडब्ल्यूडी और ना प्रशासन को जनता की परेशानी दिखाई दी। मगर जैसे ही खबर आई कि बड़े साहबों का काफिला इन रास्तों से गुजरेगा, पूरी सरकारी मशीनरी “एक्शन मोड” में आ गई।


अब शहर में लोग भी तंज कसते नजर आ रहे हैं। कोई कह रहा है “लगता है बीकानेर की सड़कें भी वीआईपी दर्शन की भूखी थीं।” तो कोई बोल रहा है “काश हर महीने कोई बड़ा नेता आता, कम से कम शहर की किस्मत तो चमकती।”
सबसे बड़ा खेल यहां यही दिखाई दे रहा है कि केवल उन्हीं रास्तों पर मरहम लगाया गया है, जहां से वीआईपी काफिला गुजरना है। बाकी शहर आज भी अपने हाल पर आंसू बहा रहा है। अंदरूनी कॉलोनियों की सड़कें अब भी टूटी पड़ी हैं, कई इलाकों में गड्ढे हादसों को न्योता दे रहे हैं, लेकिन वहां शायद कोई वीआईपी नहीं जाने वाला, इसलिए वहां विकास भी नहीं पहुंचा।


प्रशासन ने शहर को सजाने में इतनी तेजी दिखाई है कि आमजन अब पूछने लगे हैं—
“क्या बीकानेर की जनता को अच्छी सड़कें पाने के लिए हर बार किसी मंत्री या बड़े नेता के दौरे का इंतजार करना पड़ेगा?”
असल में ये पूरा मामला सिर्फ सड़क सुधार का नहीं, बल्कि उस सोच का है जिसमें आम आदमी की तकलीफ की कोई कीमत नहीं और वीआईपी रूट ही पूरा शहर मान लिया जाता है। जिन रास्तों पर जनता सालभर धूल खाती है, वे रास्ते नेताओं के आने से पहले अचानक “मॉडल रोड” बना दिए जाते हैं। शहर की जनता सब देख रही है। उसे समझ आ रहा है कि काम हो सकता था, लेकिन किया नहीं गया। जरूरत सिर्फ इतनी थी कि किसी बड़े काफिले का सायरन बजना चाहिए था।


अब देखना ये है कि वीआईपी दौरा खत्म होने के बाद भी ये सफाई, ये सक्रियता और ये विकास जारी रहता है या फिर अफसरशाही दोबारा उसी पुराने आराम मोड में लौट जाएगी, जहां जनता की शिकायतें फाइलों में धूल खाती रहती हैं।