बालवाहिनीयों के निरीक्षण में उजागर भयावह सच: क्या बच्चों की सुरक्षा की कोई कीमत नहीं?एडीजे ने दिखाई तस्वीर, लेकिन क्या प्रशासन जागेगा?

Editor बीकानेर

बालवाहिनीयों के निरीक्षण में उजागर भयावह सच: क्या बच्चों की सुरक्षा की कोई कीमत नहीं?एडीजे ने दिखाई तस्वीर, लेकिन क्या प्रशासन जागेगा?

बाल वाहिनियों में न नियम, न सुरक्षा,जज राजवी ने खोली पोल

RTO–ट्रैफिक की ढिलाई का नतीजा: ओवरलोड, बिना लाइसेंस और तेज रफ़्तार में दौड़ती बाल वाहिनियाँ

पत्रकार नारायण उपाध्याय की रिपोर्ट
दैनिक खबरां,बीकानेर। शहर में स्कूल जाने वाले मासूम बच्चों की सुरक्षा इन दिनों भगवान भरोसे चल रही है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव एवं अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश मांडवी राजवी ने पिछले एक सप्ताह में तीन बार शहर की विभिन्न बाल वाहिनियों का औचक निरीक्षण किया है। हर बार हालात और भी भयावह मिले। बाल वाहिनियों में सुरक्षा मानकों की ऐसी दुर्दशा देखकर स्वयं न्यायाधीश भी हैरान रह गईं। निरीक्षण के दौरान ज्यादातर वाहिनियों में न तो पीला निर्धारित रंग, न ‘बाल वाहिनी’ का स्पष्ट अंकन। कई वाहनों में इमरजेंसी निकास, फर्स्ट एड किट, अग्निशमन यंत्र, GPS, CCTV जैसी आवश्यक सुविधाएं तक मौजूद नहीं थीं। नियमों के अनुसार बच्चों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य ग्रिल और मेश भी अधिकतर वाहनों में नहीं लगे हुए मिले।

कई वाहनों में बच्चों को ओवरलोड कर ठूंस-ठूंसकर बिठाया गया था। ड्राइवरों के पास या तो वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, या दस्तावेज अधूरे थे। और तो और, स्पीड गवर्नर न होने के कारण ये वाहन 40 की तय सीमा के बजाय 60–70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से बेहिचक दौड़ते पाए गए। यह सीधे–सीधे बच्चों की जान को खतरे में डालने जैसा है। मौके पर ही राजवी ने कई वाहिनियों के चालान कटवाए।

सबसे खतरनाक और चौंकाने वाली बात यह है कि इन बाल वाहिनी संचालकों पर कार्रवाई का जरा भी खौफ नहीं दिखता। शहर में रोजाना सैकड़ों बाल वाहिनियां थानों, चौकियों और ट्रैफिक पुलिस पोस्टों के सामने से बिना किसी जांच-पड़ताल के गुजरती हैं,लेकिन RTO और ट्रैफिक पुलिस द्वारा कोई नियमित चेकिंग नहीं की जा रही। इस निष्क्रियता ने वाहन संचालकों के हौसले और बुलंद कर दिए हैं। RTO और ट्रैफिक पुलिस की यह लापरवाही कहीं न कहीं इन वाहन संचालकों को और भी बेखौफ कर रही है।

न्यायाधीश राजवी के लगातार प्रयासों के बावजूद सुरक्षा में सुधार नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम में गंभीर खामियां हैं। बच्चों की सुरक्षा को लेकर न तो वाहन मालिक गंभीर हैं और न ही निगरानी करने वाले विभाग। यह स्थिति किसी भी बड़े हादसे की भूमिका तैयार कर रही है।

कानून के अनुसार बाल वाहिनी संचालकों को सख्ती से निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह केवल कागजों तक सीमित दिखाई देता है। आवश्यक है कि RTO, ट्रैफिक पुलिस और जिला प्रशासन अब जल्द से जल्द संयुक्त अभियान चलाए, नियमित चेकिंग हो, और नियम तोड़ने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। राजस्थान सरकार द्वारा बाल वाहिनी संचालन के लिए कई अनिवार्य नियम और दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, जो बच्चों की सुरक्षा को केंद्र में रखकर बनाए गए हैं। लेकिन निरीक्षण में अधिकतर वाहिनियों में इन नियमों का पालन कहीं नजर नहीं आया।

सरकार के प्रमुख दिशा-निर्देश इस प्रकार हैं:

*चालक के पास कम से कम 5 वर्ष पुराना वैध ड्राइविंग लाइसेंस और कैब/बस/ऑटो श्रेणी के वाहन चलाने का 5 वर्ष का अनुभव होना आवश्यक।
*ऑटो की तुलना में बस, वैन और कैब जैसे सुरक्षित वाहनों को प्राथमिकता।
*वाहन की बैठक क्षमता सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों से निर्धारित क्षमता की डेढ़ गुना से अधिक नहीं हो सकती।
*ऑटो में बच्चों की सुरक्षा हेतु चढ़ने-उतरने वाले गेट पर लोहे की जाली लगाना अनिवार्य।
*हर वाहन में प्राथमिक उपचार बॉक्स, अग्निशमन यंत्र, बैग रखने के लिए रैक, पीने के पानी की बोतल की व्यवस्था अनिवार्य।
*वैन/बस/कैब में चालक को सीट बेल्ट लगाना जरूरी।
ऑटो की ड्राइवर सीट पर बच्चों का परिवहन वर्जित।
*चालक के पास वाली सीट पर 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को बैठाना मना।
*चालक एवं परिचालक को खाकी वर्दी पहनना अनिवार्य।
*प्रत्येक बाल वाहिनी में GPS लगाकर उसका लॉगिंग नंबर और कोड स्कूल को उपलब्ध कराना होगा।
*चालक के विरुद्ध लालबत्ती कूदने, तेज गति, शराब पीकर *वाहन चलाने या मोबाइल पर बात करते हुए पकड़े जाने की एक से अधिक चालान की स्थिति में स्कूल प्रशासन द्वारा उसे तुरंत हटाया जाएगा।
*बस में बच्चों को चढ़ाने-उतारने के लिए एक अनिवार्य परिचालक होना चाहिए।
*हर दो वर्ष में चालक-परिचालक का मेडिकल चेकअप और सुरक्षा प्रशिक्षण आवश्यक।
*बाल वाहिनी में डोर लॉक की समुचित व्यवस्था और स्पीड गवर्नर अनिवार्य है।


शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारियां भी तय, लेकिन पालन बहुत कमजोर

*प्रत्येक स्कूल-महाविद्यालय में सड़क सुरक्षा क्लब सक्रिय होना चाहिए।
*एक वरिष्ठ अध्यापक/व्याख्याता को यातायात संयोजक नियुक्त किया जाना अनिवार्य।
*संस्थान को ट्रैफिक प्लान तैयार करना होगा और स्कूल गेट पर चढ़ाने-उतारने की जगह पर CCTV कैमरा लगाना होगा।
*स्कूल द्वारा बाल वाहिनी चालक को विशेष फोटोयुक्त पीले रंग का परिचय पत्र जारी किया जाएगा।
*हर जिले में SP/उपायुक्त की अध्यक्षता में स्थाई संयोजक समिति गठित होगी, जो बच्चों की सुरक्षा के लिए नियमों का पालन सुनिश्चित करेगी।
*समिति की रिपोर्ट जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में यातायात प्रबंधन समिति को नियमित रूप से भेजी जाएगी।

न्यायाधीश मांडवी राजवी के निरीक्षण और सरकार के इन स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर हालात चिंताजनक हैं। अब सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बने ये नियम केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे या प्रशासन इन्हें धरातल पर सख्ती से लागू करेगा?