बीकानेर में ‘फीता प्रकरण’ पर सियासी सरगर्मी, विधायक पहुंचे तो उद्घाटन हो चुका था,अफसरशाही पर फिर उठे सवाल, देखें वीडियो..

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बीकानेर में ‘फीता प्रकरण’ पर सियासी सरगर्मी, विधायक पहुंचे तो उद्घाटन हो चुका था

दैनिक खबरां,बीकानेर। राजनीति और प्रशासन के रिश्तों के बीच आज बीकानेर में एक ऐसा वाकया हुआ जिसने पूरे शहर में चर्चा छेड़ दी। मामला है मुक्ताप्रसाद नगर स्थित राजकीय शहरी स्वास्थ्य केंद्र के उद्घाटन कार्यक्रम का। यहां मंच तो सजा था दो नेताओं के लिए, लेकिन फीता कटा सिर्फ एक के हाथों से।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और बीकानेर पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास को आमंत्रित किया गया था। दोनों को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. पुखराज साध ने सुबह 9 बजे तक पहुंचने का निमंत्रण दिया था।

बताया जा रहा है कि मंत्री मेघवाल समय पर पहुंच गए और उद्घाटन कर दिया गया। इस बीच विधायक जेठानंद व्यास करीब 9 बजकर 45 मिनट पर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे तो देखा कि फीता कट चुका है और कार्यक्रम भी शुरू हो चुका है। उन्होंने हालात देखकर बाहर से ही हाथ जोड़कर लौट जाना उचित समझा। इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई। क्या विधायक का इंतज़ार नहीं किया जा सकता था? क्या यह महज़ संयोग है या फिर प्रशासनिक स्तर पर कोई संकेत देने की कोशिश?

 


सीएमएचओ डॉ. पुखराज साध ने सफाई देते हुए कहा कि “सभी को 9 बजे का समय दिया गया था। विधायक जी देरी से पहुंचे, उनके पीए से भी संपर्क किया गया था। मंत्री जी समय पर आ गए, इसलिए उनसे उद्घाटन करवा लिया गया। इसे अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है।”

लेकिन मामला यहीं थमा नहीं। सोशल मीडिया पर “फीता प्रकरण” को लेकर प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। कई लोगों ने इसे अफसरशाही की मनमानी बताया है तो कुछ ने इसे “बीकानेर की सियासी खींचतान” से जोड़कर देखा है। दरअसल, यह विवाद नया नहीं है। कुछ समय पहले भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ जब बीकानेर पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास के बुलावे पर ‘विधायक सुनवाई केंद्र’ के उद्घाटन में आए थे, तब भी मंच से अधिकारियों की मनमर्जी पर सवाल उठे थे। उस वक्त राठौड़ ने कहा था “अधिकारी यह न भूलें कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का सम्मान सर्वोपरि है।”

अब मुक्ताप्रसाद अस्पताल का यह “फीता प्रकरण” उन्हीं आरोपों की गूंज को फिर से ज़िंदा कर गया है। शहर में अब एक ही सवाल गूंज रहा है। क्या यह महज़ संयोग है, या बीकानेर का प्रशासन वाकई किसी एक ‘इशारे’ पर चल रहा है?