बसंत पंचमी: तब बच्चे खेलते थे, आज मोबाइल देखते हैं..
नारायण उपाध्याय@दैनिक खबरां। बसंत पंचमी भारतीय जीवन में सिर्फ एक तिथि नहीं रही, बल्कि यह मौसम, मन और संस्कार—तीनों के बदलने का संकेत हुआ करती थी। खासकर बच्चों के लिए यह दिन किसी त्योहार से कम नहीं होता था। ठंड की विदाई के साथ पीले फूल, पीले कपड़े और पीले पकवान जैसे बच्चों की दुनिया में अपने आप रंग भर देते थे।
एक समय था जब बसंत पंचमी आते ही बच्चों को मौसम बदलने का एहसास हो जाता था। सुबह हल्की धूप होती, हवा में एक अलग सी मिठास रहती और घरों में सरस्वती पूजा की तैयारी शुरू हो जाती। कई घरों में बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर लिखवाए जाते थे। स्लेट पर “अ आ इ” लिखते हाथ कांपते थे, लेकिन चेहरे पर गर्व साफ दिखाई देता था।
तब मोबाइल नहीं थे। बच्चों का ध्यान स्क्रीन में नहीं, बल्कि आसपास की दुनिया में रहता था। बसंत पंचमी के दिन छतों पर पतंगें उड़ती थीं, मोहल्लों में बच्चों की टोलियां बन जाती थीं। किसी के पास रंगीन पतंग होती, तो किसी के पास मांझा। हार-जीत से ज्यादा जरूरी साथ खेलना होता था। शाम होते-होते कपड़े जरूर मैले हो जाते थे, लेकिन आंखों में खुशी पूरी चमक के साथ रहती थी।
घर में मां के हाथ के बने मीठे चावल, हलवा या खीर बच्चों के लिए किसी त्योहार के प्रसाद जैसे होते थे। बिना कहे ही समझ आ जाता था कि आज का दिन खास है। न कोई नोटिफिकेशन, न कोई रिमाइंडर बस मौसम और माहौल ही सब कुछ बता देता था।
आज का बच्चा पहले से ज्यादा जानकार है, लेकिन उसकी दुनिया कहीं ज्यादा सीमित भी हो गई है। बसंत पंचमी अब अधिकतर मोबाइल कैमरे तक सिमट गई है। पूजा की तस्वीरें तो खिंच जाती हैं, लेकिन वह अपनापन, वह इंतजार और वह उत्साह धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। पतंग अब छत पर नहीं, पोस्टर या स्क्रीन पर दिखाई देती है।
यह तुलना किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। समय बदला है, जरूरतें बदली हैं। लेकिन यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या हम बच्चों से मौसम का एहसास, मिट्टी की खुशबू और त्योहारों की आत्मा छीनते जा रहे हैं?
बसंत पंचमी आज भी वही है वही तिथि, वही मौसम, वही संदेश। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले बसंत बच्चों के साथ खुद चला आता था,
और आज हमें उसे जानबूझकर बच्चों के जीवन में लाना पड़ रहा है।
अगर इस बसंत पंचमी पर बच्चों का मोबाइल थोड़ी देर रखवाकर उन्हें किताब, संगीत, चित्र या खुले आकाश के पास बैठा दिया जाए, तो शायद बसंत फिर से बच्चों के बचपन में खिल उठे।

