आयुक्त-महापौर के विवाद में उलझी थांरी-म्हारी शहरी सरकार,मंत्रीजी का दर्द छलका,यूआईटी कुर्सी को भी लग गया ग्रहण!
पत्रकार नारायण उपाध्याय की कलम से..
बीकानेर@दैनिक खबरां। बीकानेर में शहरी सरकार जनता की उम्मीदों पर फिसड्डी साबित हो रही है। जिस उम्मीद में शहर के वोटरों ने मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लेकर लोकतांत्रिक शहरी सरकार चुनी थी, वो धरातल पर काम की बजाय केवल अखबारों के पन्नो में थांरी-मारी वाली सुर्खियों बटोर रही है। निगम में सत्ताधारी बीजेपी बोर्ड से महापौर व आयुक्त के विवाद के चर्चे जयपुर तक गूंज रहे है। महापौर का कहना है कि आयुक्त साहब मंत्री कल्ला की शह पर निगम में अपनी मनमानी चला रहे है,जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मंत्रीजी का दर्द छलका!
इस बयां के बाद बीते दिनों मंत्री कल्ला भी इस विवाद की आग में कूद पड़े, जंहा उन्होंने महापौर पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि महापौर के आरोपों का जवाब देना मेरा लेवल नहीं है। मैं उनके बराबर नहीं होना चाहता। जिस दिन उनके बराबर हो जाऊंगा, सारी पोल खोल दूंगा। हालांकि कल्ला ने शुरुआत में नगर निगम में महापौर और आयुक्त के बीच चल रहे विवाद से खुद को अलग करने का प्रयास किया। बाद में जनता का दर्द और शहर की दुर्दशा के साथ उनसे पार्षदों के मिलने जैसे सवालों की बौछार पर डॉ. कल्ला का दर्द जुबान पर आ गया। यंहा तक कि कांग्रेस और बीजेपी के चुने हुए पार्षद तक आपस में उलझ रहे है जंहा बीते दिनों मंत्री कल्ला के निवास पर किसी मीटिंग को लेकर एकत्रित हुए कांग्रेसी पार्षद मंत्री के सामने ही आपस में तू-तड़ाके और गाली गलौज पर उतर आये थे जिसके बाद मंत्री जी को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था।
कुल मिलाकर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को ही आमजन की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं रहा है। शहर में आवारा सांड, आवारा कुत्तो को पकड़ने का काम फाइलों में दब गया है। वंही सीवरेज जाम व कचरा संग्रहण समय पर नहीं हो पा रहा है जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है। इन सबके पीछे बड़ा कारण महापौर-आयुक्त विवाद बताया जा रहा है।
मजे की बात यह है कि निगम में वर्तमान बोर्ड की इक्का दुक्का ही साधारण सभाएं/बैठकें हुई है। इन बैठकों की बजाय गुटबाजी में समय दिया जा रहा है। वंही निगम में टेंडर भी विवाद की भेंट चढ़ रहे है। महापौर सार्वजनिक स्थान पर पोस्टर लगाकर आयुक्त के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप लगा रही है। इन सब को देखकर शहरी जनता अच-अंभित है कि आखिर ये सब क्या हो रहा है?
ऐसे में एक बात तो निगम आयुक्त को भी सोचनी चाहिए कि वो जनता के सेवक है, भले ही राजनेता जनता के सामने अपना डेकोरेम बरकरार रखते हुए किसी बात पर अड़ जाए तो क्या किसी राजसेवक को भी इस तरह हठधर्मिता अपनाते हुए बराबरी करनी चाहिए? वंही राजनेताओं को भी सोचना चाहिए कि अगर उनकी यही जवाबदेही जनता के प्रति रही तो अगली बार वोट उन्हें कौन देगा? दोनों पक्षों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।
यूआईटी कुर्सी को लग गया ग्रहण!
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में कुछ ही माह शेष है, लेकिन अभी भी कुछ राजनितिक नियुक्तियां पेंडेंसी में चल रही है। इनकी चाल को देखकर अब ऐसा लगने लगा है कि सरकार अब इन कुर्सियों पर किसी को सत्ता सुख नहीं देने के मत में है। इनमे से एक महत्वपूर्ण कुर्सी अपने नए अध्यक्ष की बेसब्री से बाट जोह रही है। इस कतार में बीकानेर के यूआईटी चेयरमैन की कुर्सी है।
यूआईटी अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं होने के कारण यह कुर्सी धूल झोंक रही है जिसके चलते कई महत्वपूर्ण फाइले रुकी हुई है।
मजे की बात यह है कि अब इसके चाह रखने वालों की संख्याबल में कमी देखने को मिल रही है। इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि जिसकी जितनी पहुंच या सिफारिश थी वो सब जुगाड़ कर चुके, जयपुर दिल्ली जिसके यंहा हाजिरी लगानी थी, वो सब जतन कर चुके। लेकिन सेहरा प्रदेश नेतृत्व के पसंदीदा चेहरे वाले को बंधेगा। प्रदेश कांग्रेस के एक बड़े लीडर के मुताबिक ये राजनितिक नियुक्तियाँ कब कि हो चुकी होती, लेकिन इस दरम्यान सरकार संकट में आ गई, फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव और अब राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा प्रदेश में आ रही है। ऐसे में पूरी प्रदेश सरकार इन सब कार्यक्रम के इर्द गिर्द मंडराती रहेगी। बहरहाल चाहे कैसा भी कारण हो नुकसान तो जनता को ही उठाना पड़ रहा है।

