हाल ए पीबीएम : गलत खून, लापरवाह सिस्टम और मौन जनप्रतिनिधि, आखिर जवाबदेही किसकी?कब आएंगे अच्छे दिन!
दैनिक खबरां(नारायण उपाध्याय)कभी अव्यवस्थाओं को लेकर, कभी संसाधनों की कमी तो कभी लापरवाही के मामलों में सुर्खियों में रहने वाला बीकानेर का पीबीएम अस्पताल एक बार फिर इंसानी जान के साथ खिलवाड़ के आरोपों में घिर गया है। इस बार मामला बेहद गंभीर है, जब आचार्य तुलसी कैंसर विंग में भर्ती 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला को गलत ब्लड ग्रुप का खून चढ़ा दिया गया। यह कोई मामूली चूक नहीं बल्कि सीधे तौर पर मरीज की जान को जोखिम में डालने वाला मामला है, जिसने पीबीएम प्रशासन, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और अस्पताल की मॉनिटरिंग व्यवस्था की पोल खोल दी है।
घटना के अनुसार महिला को खून की भारी कमी के चलते कैंसर विंग में भर्ती किया गया था। पहले सही ब्लड यूनिट चढ़ाई गई, लेकिन दूसरी यूनिट के समय ब्लड बैंक से गलत ग्रुप का खून जारी कर दिया गया। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह रहा कि कैंसर विंग के नर्सिंग स्टाफ ने बिना किसी क्रॉस चेक और बिना मरीज की पूरी पहचान सुनिश्चित किए, वही गलत ब्लड मरीज को चढ़ा दिया। जैसे ही ट्रांसफ्यूजन शुरू हुआ, महज 30 सेकेंड के भीतर मरीज की हालत बिगड़ने लगी। तभी वहां मौजूद एक परिजन की नजर ब्लड यूनिट पर पड़ी और उसने तुरंत डॉक्टर व नर्सिंग स्टाफ को बुलाकर ट्रांसफ्यूजन रुकवाया, जिससे समय रहते मरीज की जान बच सकी।
इस पूरे मामले की जड़ अस्पताल की कार्यप्रणाली में छिपी गंभीर लापरवाही में नजर आती है। कैंसर विंग में एक ही नाम की दो महिला मरीज भर्ती थीं, जिनके पति के नाम और अन्य पहचान विवरण अलग-अलग थे। इसके बावजूद नर्सिंग स्टाफ ने मरीज की पहचान मिलाने की आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं की और एक मरीज के लिए मंगवाया गया ब्लड दूसरी मरीज को चढ़ा दिया गया। यह सीधे तौर पर सरकारी ब्लड ट्रांसफ्यूजन प्रोटोकॉल और मरीज सुरक्षा मानकों का उल्लंघन है।
घटना की सूचना मिलने पर मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल मौके पर पहुंचे और जांच की बात कही गई। कैंसर विंग के विभागाध्यक्ष भी मौके पर पहुंचे। प्रशासन की ओर से जांच कमेटी गठित करने और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। हालांकि, पीबीएम में यह पहला मामला नहीं है। सवाल यह है कि क्या इससे पहले हुई लापरवाहियों पर कभी कोई ठोस और दिखने वाली कार्रवाई हुई है, या फिर हर बार की तरह इस बार भी मामला जांच रिपोर्ट, नोटशीट और फाइलों में दबा दिया जाएगा।
गलत खून चढ़ाने की इस गंभीर घटना के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर नाराजगी और गहरी हो गई है। जनप्रतिनिधियों और नेताओं ने अस्पताल पहुंचकर विरोध दर्ज कराया और आरोप लगाया कि पीबीएम में सामग्री उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को इंजेक्शन, ग्लूकोज और कैनुला तक बाहर से मंगवाए जा रहे हैं। यह स्थिति केवल नर्सिंग स्टाफ तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे पीबीएम अधीक्षक, मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल, अस्पताल प्रशासन, ब्लड बैंक प्रबंधन, मॉनिटरिंग अधिकारियों और नोडल एजेंसियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा अब सिस्टम की नहीं, बल्कि किस्मत और परिजनों की सतर्कता पर निर्भर होती जा रही है। अगर उस वक्त परिजन ब्लड यूनिट पर नजर न डालता, तो शायद आज कहानी कुछ और होती। ऐसे में अब सिर्फ बयान, जांच कमेटी और आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। यह घटना सीधे-सीधे मांग करती है कि मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल, पीबीएम अधीक्षक और अस्पताल की मॉनिटरिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी तय हो, दोषियों के नाम सार्वजनिक हों और कार्रवाई कागजों से निकलकर जमीन पर दिखे। क्योंकि अगर आज इस लापरवाही पर आंख मूंद ली गई, तो कल किसी और मरीज की जान चली गई, तो जवाब देने वाला कोई नहीं होगा—और तब जिम्मेदारी सिर्फ सिस्टम की नहीं, बल्कि चुप रहने वालों की भी होगी।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद जनप्रतिनिधियों का अस्पताल ना पहुंचना और नाराजगी ना जताना भी दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं लगता। अब यहां एक अहम सवाल बीकानेर पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास को लेकर भी उठता है। हाल ही में वे एक कार्यकर्ता के इलाज को लेकर देर रात पीबीएम ट्रॉमा सेंटर पहुंचे थे। उनकी ओर से बार-बार यह कहा जाता है कि वे प्रशासन को सख्त निर्देश देते रहते हैं कि किसी भी तरह की लापरवाही न हो। लेकिन अगर अपनी ही सरकार में, अपने ही क्षेत्र के सबसे बड़े अस्पताल में इतनी बड़ी चूक हो जाती है, तो ये “निर्देश” आखिर किस कागज पर लिखे गए थे? जब सत्ता पक्ष का विधायक ढुलमुल और बेअसर नजर आए, तो विपक्ष में होते तों क्या उम्मीद की जाए,यह सवाल खुद-ब-खुद खड़ा हो जाता है।

